मैंने कई लोगों से सुना है , "वो तारे बन जाते हैं" ।
मुझे भी ऐसा ही लगता है , "जब कोई मरता है, तो वो तारा बन जाता है" ।
"पर वो वहाँ क्या करता है ?"
शायद वो आसमाँ से हर वक़्त धरती को देखता रहता है और अपने "soulmate" को ढूंढता रहता है । जिस दिन उसे उसकी soulmate दिख जाती है, उस दिन वो आसमाँ से जुदा होने की ज़िद करता है ।
आसमाँ उसे समझाता है की उसकी ज़गह धरती पे नहीं आसमाँ मे है । वो उसे बार बार कहता है: "अगर तुम धरती पे वापस गए तो तुम्हारा अस्तित्व नहीं बचेगा, तुम जल के राख हो जाओगे ।"
ये सुन के तारा आसमाँ से कहता है : "इश्क़ से भी बड़ि कोई आग है क्या ?"
और वो आसमाँ से टूट के निकल पड़ता है धरती की ओर.....
बस फिर कुछ नहीं बचता, सिर्फ उसकी रौशनी बचती है कुछ पल के लिए । सारी दुनिया उसे जलते हुए देखती है, और वो जलते हुए अपने soulmate के पास कहीं धरती पे गिर के ख़त्म हो जाता है ।
पर उसका जलना बेकार नहीं जाता, पता है क्युँ ?
क्यूंकि उस टूटते हुए तारे को देख के कोई भी मन्नत मांगो तो वो पूरी हो जाती है ।